एक ज़रा सा ग़म-ए-दौराँ का भी हक़ है जिस पर,
मैने वो साँस भी तेरे लिये रख़ छोड़ी है,
तुज़पे हो जाउंगा क़ुरबान तुज़े चाहुंगा,
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुज़े चाहुंगा…
अपने जज़बात में नग़मात रचाने के लिये,
मैंने धड़कन की तरह दिलमें बसाया है तुज़े !
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करुं !
मैंने किस्मत की लक़ीरों से चुराया है तुज़े,
प्यार का बन के निग़हबान तुज़े चाहुंगा…
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुज़े चाहुंगा…
तेरी हर चाप से जलते है ख़यालों में चराग़,
जब भी तु आए, जगाता हुआ जादु आए !
तुज़को छु लुं तो फिर ऐ जान-ए-तमन्ना मुज़को,
देर तक अपने बदन से तेरी ख़ुश्बु़ आए !
तु बहारोँ का है उन्वाँ, तुज़े चाहुंगा,
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुज़े चाहुंगा…
- अहमद फराज.
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