10.7.10

"િમલન" 
 
એ અને હું મળ્યા વાતો ઘણી કરી
પણ મન ની વાતો તો રહી ગઈ
મળ્યા એવા અમે સાવ એકલાજ હતા
કશી હકીકત એ એના મન ની વાત ચાત કરી જ નિહ
એ ને હું સાથે હતા , હું એના મન ને વાંચતો 
પણ કઈ સમજી ના શકાયો , સમજવું હતું એના મન ને 
તેથી જ તો મળ્યો હતો
મળ્યા અમે એવા મળ્યા
જુદા થયા અમે એવા જુદા થયા 
શું ? સદા ને માટે અમે જુદા થયા 
બસ મારું મન એમ જ રોયા કરે છે

 तेरा मन चाहे वो कर 
फूल  कोई तोड़े तो तोड़ ने दे 
तेरी ये फूलदानी की कोई कदर नहीं  
तुजे कोई चाहे तो चाहने दे 
ये दुनिया में चाहनाराओ  की कोई गीनती नहीं  
तेरा मन छाहे वो कर 
दील तुज से कोई जोड़ ने आये तो जोड़ ने दे 
दील तोड़ने वाले की कोई गीनती नहीं 
तेरे साथे वफ़ा करे तो होने दे 
ये दुनिया में बेवफाई करने वाली की कोई गीनती नहीं 
तेरा मन चाहे वो कर 
तुजे कोई [यार करे तो कर ने दे 
नफरत करने वालों की कोई गीनती नहीं 
तेरी गरज है कीसी को तो गरज करने दे 
ये दुनिया में गरजवान वाले की कोई गीनती नहीं 
तेरा मन चाहे वो कर  
तुजे कोई सपना आये तो आने दे 
यनहा एहसास करने वाले की कोई कमी नहीं 
हे "..." तेरा मन चाहे वो कर 
તારું મન કહે તે કર


ફૂલ ને કોઈ તોડે તોડવા દે
તારી આ ફૂલદાની માં કોઈ કદર નથી
તને કોઈ ચાહે તો ચાહવા દે 
આ દુનિયા માં ચાહનાર ઓ ની કોઈ ગણતરી નથી 
તારું મન કહે તે કર
િદલ ને કોઈ જોડે તો જોડવા દે 
િદલ તોડનારા ઓ ની કોઈ ગણતરી નથી
તારી સાથે વફાઇ થાય તો થવા દે
આ દુિનયા માં બેવફાઈ કરનારાઓ નો કોઈ ગણતરી નથી
તારું િદલ કહે તે કર 
તને કોઈ પ્યાર કરે તો કરવા દે 
નફરત કરવાવાળા ઓ ની કો ગણતરી નથી
તારી ગરજ ને કોઈ સરે તો સારવા દે
આ દુિનયા માં બેગર્જુઓ ની કોઈ ગણતરી નથી
તારું મન કહે તે કર 
તને કોઈ સપનું આવે તો આવવા દે
અહીં એહસાસ કરવાવાળા ની કોઈ ગણતરી નથી
હે "..." તને તારું મન કહે તે કર

11.5.10

" भारत  पाकीस्तान  के  समबन्ध  "

बचपन  से  यही  सुनता  था  की  पाक  हमारा  दुश्मन  है ,
पुछु  कीस  से , कौन  बताए  दोनों  में  क्या  अनबन  है ...
अनबन  क्या  है , झगडा  क्या  है  पुछु  में  सबसे  जाकर ,
सब  बोले  नादान  है  तू  समझेगा  न  तू  खुलकर ...
में  बोलू  गधे  ही  तुम  सब  कुछ  भी  पता  न  है  तुमको ,
पता  नहीं  है  कुछ  भी  फीर  क्यों  भड़काए  हम  सबको ...
थक  हारकर  घर  में  पहोचा  पुचा  माँ  से  जाकर ,
क्यों  लड़ते  है  यह  दोनों  तुम्ही  बतादो  माँ  खुलकर ...
माँ  बोली  कुछ  यु  हसकर  बेटा  तू  क्यों  डरता  है ,
दोस्ती  करने  को  हम  तो  क्या , पाकीस्तान  भी  मरता  है ...
राजनीती  के  इस  खेल  ने  इन  दोनों  को  है  यु  तोडा ,
जुडे  हुए  थे  दील  हम  सबके , इसने  है  रिश्तो  को  तोडा ...
क्या  मतलब  था  माँ  का  मैं  तो  कुछ  भी  समझ  न  पाया ,
सोच  सोचकर  रात  बीत  गयी , में  तो  सो  न  पाया ...
अब  बड़ा  हुआ  तो  सोचता  हु  क्यों  न  नया  जहां  बनाये ,
बीती  बीसरी  भूलकर  क्यों  न  अमन  ही  अमन  फैलाये ...
जो  बड़े  न  कर  सके  क्यों  न  हम  ही  वोह  कर  जाए ,
आगे  बढ़कर  क्यों  न  हम  दोस्ती  का  हाथ  बढ़ाये ...
सबको  बस  में  यही  कहूँगा  प्यार  के  दीये  जलाओ ,
इन  दीया  के  सब  अंधियारों  को  रोशन  कर  जाओ ...
लीखो  ऐसा  पैगाम  ख़ुशी  का  दुनीया  खुश  हो  जाये ,
प्यार  की  दुनीया  में  अपना  नाम  अमर  हो  जाये ...
जय  Hind...
हैल  इंडिया , हैल  पाकीस्तान ...
-वीश्वास

***

दे के दील हम जो ही गए मजबूर ,

" दे  के  दील  हम  जो  ही  गए  मजबूर "
 
दे  के  दील  हम  जो  ही  गए  मजबूर ,
इस  में  क्या  इखतीयार  है  अपना  
बे -खुदी  ले  गयी  कहाँ  हम  को , 
दीर  से  इंतज़ार  है  अपना ,
रोते  फीरते  हैं  सारी - सारी  रात , 
अब  यही  रोज़गार  है  अपना , 
दे  के  दील  हम  जो  हो  गए  मजबूर , 
इस  में  क्या  इखतीयार   है  अपना,  
कुछ  नहीं  हम  मीसाल - ऐ - अनका    लेक , 
शहर - शहर  इश्तेहार  है  अपना , 
जीस  को   तुम  आसमान  कहते  हो , 
सो  दीलों  का  गुबार  है  अपना ,

कहीं चांद

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई  मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई  मिरी दास्ताँ का उरूज था तिरी नर्म पलकों की ...